प्रेम और शांति

सीरिया के किसीक्षतिग्रस्त घर मेंछुपन-छुपाईखेलते बच्चे किसी दूसरे देशमें गश्त लगताकोई युवासैनिक किसी शरणार्थी कैम्पके तंबू सेआसमान निहारताएक बुज़ुर्ग जानते है की खाना-पानी से भीपहले जीवन में प्रेम और शांतिकितनी जरूरी है। वियांश Image credits - Pixabay

बाघ

जंगल से लेकरडंपिंग यार्ड तक का सफ़रस्वछंद शिकार से फेंका मांस खाने तक का सफ़रशिकार करने सेखुद शिकार बनने तक का सफ़रराष्ट्रीय पशु सेसर्कस के कैदी तक का सफ़रकॉर्बेट की कहानियों सेकेदारनाथ की कविताओं तक का सफ़रएक बाघ यूँ कब तक 'सफ़र' करेगा! - वियांश Image credit - twitter  

ग़ज़ल

मन में दबी सिसकियां तो देखिए। उस उम्रदराज़ की गलतियाँ तो देखिए। मानवता छोड़ आए सत्ता की तलाश में हुक्मरानों की बढ़ती ये मजबूरियाँ तो देखिए। दाम मिला तो काट दिए सारे फूल बाग़बान से अब डरती कलियाँ तो देखिए। छोड़ गए वसीयत में दादागिरी अपनी जुर्म से थर्राती ये गलियाँ तो देखिए। छोटी सी... Continue Reading →

अनोखी दोस्ती

एक अनोखी सी दोस्ती थी मेरी ओर उसकी। जब भी इन रोजमर्रा के क्रियाकलापों से हम दोनों ऊब जाते तो कुछ नया करने के विचारो को दिमाग में दौड़ाते। उसे पेंटिंग का काफी बड़ा शौक था ओर मुझे लेखनी का। जैसे जैसे वो कैनवास पे रंगों को बारी बारी से सजाती जाती मैं भी ठीक... Continue Reading →

कहानीकार

एक कहानीकार जब बनाता है एक कहानी तो बनाता जाता हैं एक एक अंग कहानी का। शुरुआत मुँह से हो और अंत पैरो पे हो, यह हर समय जरूरी नहीं। कभी मुँह पे पैर लग जाते है या कभी कोई पैर से हाथ। पर ये जो कहानीयाँ होती है इसकी सीमा भी कहाँ कोई सीमित... Continue Reading →

मसअला

काफ़ी देर तक घऱ के इधर उधर उड़ते कबूतर से पूछा मैंने क्या मसअला हुआ है, जनाब! जो इतना घबराते हो। बात है कोई पेचीदा। तो हमसे क्यों नहीं बतलाते हो। हाँफती गुटर-गु की आवाज़ को रोकते हुए कहा उसने क्या, बताए मियाँ! गाँव छोड़ शहर को जो आये थे। न जाने कितने घोसलों से... Continue Reading →

दरिया

दरिया बहता है एक, मेरे घर के पास।। एक ओर अमीरों की बस्ती है, दूसरी ओर गरीबों की जन्नत। अमीर दिख जाते है शाम सुबह चहलकदमी करते कभी कभी। और ग़रीबो का क्या, उनका दिन शुरू भी यही होता है और अंत भी। पानी में उछल कूद, करतब रोजमर्रा की कहानी है इन की, जबकि... Continue Reading →

मुन्नू

मेरा घर रेलवे पटरी के नज़दीक है। सुबह आँख कभी - कभी गुजरने वाली लोकल ट्रैन से खुल जाती है, तो कभी पास ही में हुए किसी हो हल्ले से। हो हल्ला !! अरे क्या में भी, आपको बताना ही भूल गया। में वही तो हूँ जिसे आप ट्रैन में बैठे देख रोज़ कुछ न... Continue Reading →

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