ग़ज़ल

मन में दबी सिसकियां तो देखिए। उस उम्रदराज़ की गलतियाँ तो देखिए। मानवता छोड़ आए सत्ता की तलाश में हुक्मरानों की बढ़ती ये मजबूरियाँ तो देखिए। दाम मिला तो काट दिए सारे फूल बाग़बान से अब डरती कलियाँ तो देखिए। छोड़ गए वसीयत में दादागिरी अपनी जुर्म से थर्राती ये गलियाँ तो देखिए। छोटी सी... Continue Reading →

अनोखी दोस्ती

एक अनोखी सी दोस्ती थी मेरी ओर उसकी। जब भी इन रोजमर्रा के क्रियाकलापों से हम दोनों ऊब जाते तो कुछ नया करने के विचारो को दिमाग में दौड़ाते। उसे पेंटिंग का काफी बड़ा शौक था ओर मुझे लेखनी का। जैसे जैसे वो कैनवास पे रंगों को बारी बारी से सजाती जाती मैं भी ठीक... Continue Reading →

कहानीकार

एक कहानीकार जब बनाता है एक कहानी तो बनाता जाता हैं एक एक अंग कहानी का। शुरुआत मुँह से हो और अंत पैरो पे हो, यह हर समय जरूरी नहीं। कभी मुँह पे पैर लग जाते है या कभी कोई पैर से हाथ। पर ये जो कहानीयाँ होती है इसकी सीमा भी कहाँ कोई सीमित... Continue Reading →

मसअला

काफ़ी देर तक घऱ के इधर उधर उड़ते कबूतर से पूछा मैंने क्या मसअला हुआ है, जनाब! जो इतना घबराते हो। बात है कोई पेचीदा। तो हमसे क्यों नहीं बतलाते हो। हाँफती गुटर-गु की आवाज़ को रोकते हुए कहा उसने क्या, बताए मियाँ! गाँव छोड़ शहर को जो आये थे। न जाने कितने घोसलों से... Continue Reading →

दरिया

दरिया बहता है एक, मेरे घर के पास।। एक ओर अमीरों की बस्ती है, दूसरी ओर गरीबों की जन्नत। अमीर दिख जाते है शाम सुबह चहलकदमी करते कभी कभी। और ग़रीबो का क्या, उनका दिन शुरू भी यही होता है और अंत भी। पानी में उछल कूद, करतब रोजमर्रा की कहानी है इन की, जबकि... Continue Reading →

मुन्नू

मेरा घर रेलवे पटरी के नज़दीक है। सुबह आँख कभी - कभी गुजरने वाली लोकल ट्रैन से खुल जाती है, तो कभी पास ही में हुए किसी हो हल्ले से। हो हल्ला !! अरे क्या में भी, आपको बताना ही भूल गया। में वही तो हूँ जिसे आप ट्रैन में बैठे देख रोज़ कुछ न... Continue Reading →

Maurder’s magic

Hogwarts, Hogwarts, Hoggy warty Hogwarts, Teach us something please. Weather we be old and bald Or young with scabby knees, Our heads could do with filling With some interesting stuff, For now they're bare and full of air, Dead flies and bits of fluff, So teachers thinks worth knowing, Bring back what we've forgot, Just... Continue Reading →

थड़ी

खोलती चाय जब केटली से कांच की गिलास में उड़ेली जाती है। तो एक समां बना देती है आसपास कोई उसकी खुशबू में ही अपनी तकलीफें भूल जाता है तो कोई उस ग्लास से आती भाप में घुल जाता है। किसी को पास बन रहे सिगरेट के छल्लो से असहजता है तो किसी का ध्यान... Continue Reading →

तनिक धीरे चले क्या?

तनिक धीरे चले क्या? शहर की भाग दौड़ भरी जिंदगी को मोड़ ट्राफिक के रुकते बढ़ते क्रमो को तोड़ कुछ अधूरे कुछ पूरे कामों को छोड़ तनिक _ _ _ _ ? कुछ दिन सादगी को अपनाने दबाए हुए विचारों को फिर से जगाने मन की कश्ती का रुख़ बदल के, देखे क्या ? तनिक... Continue Reading →

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